जिला जज ने महिलाओं को किया गया जागरूक

ख़बर उन्नाव से है। जहाँ जिला विधिक सेवा प्राकिधकरण उन्नाव द्वारा जनपद न्यायाधीश प्रतिमा श्रीवास्तव की अध्यक्षता में दिल्ली पब्लिक स्कूल अकरमपुर में महिलाओं के संरक्षण और कल्याण से सम्बन्धित एवं लैंगिक समानता के विषय में विधिक जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में माननीय जनपद न्यायाधीश द्वारा महिलाओं के संरक्षण और कल्याण से सम्बन्धित एवं पी0सी0पी0एन0डी0टी0 एक्ट के विषय में बताया गया कि भारतीय कानून में महिलाओं को 11 अलग-अलग अधिकार मिले है। इनमें अहम हैं दफ्तर में यौन उत्पीड़न के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार। किसी घटना की स्थिति में जीरो एफआईआर दर्ज करने का अधिकार और बराबर वेतन पाने का अधिकार। पी0सी0पी0एन0डी0टी0 एक्ट के विषय में बताया गया कि गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 भारत की संसद द्वारा पारित अधिनियम है। जिसे कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और भारत में गिरते लिंगानुपात को रोकने, प्रसवपूर्व लिंग चयन को प्रतिबंधित करने लिये अधिनियमित किया गया था। इस अधिनियम को लागू करने का मुख्य उद्देश्य गर्भाधान से पहले अथवा बाद में लिंग चयन तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना और लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिये प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग को रोकना है।
अल्पना सक्सेना अपर जिला जज प्रथम द्वारा महिलाओं के कानूनी अधिकार के बारे में बताते हुये कहा कि घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार- भारतीय संविधान की धारा 498 के अंतर्गत पत्नी, महिला लिव-इन पार्टनर या किसी घर में रहने वाली महिला को घरेलू हिंसा के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार मिला है। पति, मेल लिव इन पार्टनर या रिश्तेदार अपने परिवार के महिलाओं के खिलाफ जुबानी, आर्थिक, जज्बाती या यौन हिंसा नहीं कर सकते। आरोपी को 3 साल गैर-जमानती कारावास की सजा हो सकती है या जुर्माना भरना पड़ सकता है। किसी महिला आरोपी को सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं कर सकते। अपवाद में फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेड के आदेश को रखा गया है। कानून यह भी कहता है कि किसी से अगर उसके घर में पूछताछ कर रहे हैं तो यह काम महिला कांस्टेबल या परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में होना चाहिए।

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